Home प्रदेश लड़के-लड़कियां अपने अभिभावकों से करें विद्रोह, दहेज को कहे ना: सुशील मोदी

लड़के-लड़कियां अपने अभिभावकों से करें विद्रोह, दहेज को कहे ना: सुशील मोदी

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एक हिन्दी दैनिक अखबार की ओर से 21 दिवसीय अभियान ‘दहेज को कहे ना’ के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने युवा पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि अगर लड़के हिम्मत दिखाये और कहे कि उनके अभिभावक दहेज लेंगे तो वे विद्रोह कर देंगे तो दहेज की प्रथा बंद हो जायेगी।

प्राचीन काल में भारतीय समाज में दहेज की प्रथा नहीं थी। स्वयंवर के जरिए लड़कियां अपने लिए योग्य व सक्षम वर की तलाश करती थी। आज तिलक-दहेज एक अभिशाप है और धीरे-धीरे यह समाज के गरीब तबकों में तेजी से फैलता जा रहा है।
युवा अपने आत्मसम्मान और गरिमा के लिए दहेज की भीख नहीं मांगे बल्कि खुद की क्षमता पर भरोसा करें। लड़कियों को भी शिक्षित कर आत्म निर्भर बनाने की जरूरत है। करीब 2 हजार साल पहले एलेक्जेंडर ग्रेट के समय भारत आए मैगस्थनीज ने अपने यात्रा वृतांत में दहेज का कोई जिक्र नहीं किया है। यह बाद में सोच बनी कि जितना ज्यादा पैसा देंगे उतना ही अच्छा लड़का मिलेगा। स्वयंवर में सीता ने राम को चुना, तब कौन ताकतवर हैं, कौन सक्षम है, उसका चयन होता था। प्राचीन काल में कहीं कोई दहेज की प्रथा नहीं थी।दहेज प्रथा को आगे बढ़ाने में महिलाओं की भी बड़ी भूमिका है। दहेज के कारण ही आज लड़की पैदा होती है तो लोग मायूस हो जाते हैं और लड़ाकों के जन्म होने पर उन्हें लगता है कि सोने की खदान मिल गई है। लड़कों को भी लगता है कि मुफ्त का माल और गाड़ी मिल रही है। बिहार जयप्रकाश और क्रान्ति की धरती है। लड़के हिम्मत दिखाएं, आगे बढ़कर दहेज के खिलाफ विद्रोह करने का संकल्प लें।

दहेज का कानून 1961 में बना। मगर केवल कानून से इस सामाजिक बुराई को दूर नहीं किया जा सकता है। सामाजिक बुराई को जन अभियान से ही खत्म किया जा सकता है। जिनके घरों में शादी होती है वह हिम्मत के साथ ऐलान करें और निमंत्रण कार्ड पर लिखे कि मैंने इस शादी में कोई तिलक-दहेज नहीं लिया है।

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