Home लोकमत स्पेशल 3000 सिखों की हत्या कांग्रेस सरकार में हुई थी, इसपर कांग्रेस का बचाव शुरू से

3000 सिखों की हत्या कांग्रेस सरकार में हुई थी, इसपर कांग्रेस का बचाव शुरू से

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31अक्टूबर 1984 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगा भड़क गए जिसमें आधिकारिक रूप से 2733 सिखों को निशाना बनाया गया। गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 3870 थी।

सीबीआई की राय में ये सिख विरोधी दंगा इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सहमति से आयोजित किये गए थे।

दंगों का सबसे अधिक असर दिल्ली पर हुआ। देशभर में सिखों के घरों और उनकी दुकानों को लगातार हिंसा का निशाना बनाया गया। 1984 के सिख विरोधी दंगे भारतीय सिखों के ख़िलाफ़ थे। इन दंगो का कारण था इंदिरा गाँधी के हत्या उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा जो की सिख थे। उसी के जवाब में ये दंगे हुए थे। इन दंगो में 3000 से ज़्यादा मौतें हुई थी। सीबीआई के राए में ये सभी हिंसक कृत्य दिल्ली पुलिस के अधिकारिओं और इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सहमति से आयोजित किये गए थे।

राजीव गाँधी जिन्होंने अपनी माँ की मौत के बाद प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी और जो कांग्रेस के एक सदस्य भी थे, उनसे दंगों के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने कहा था, “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब पृथ्वी भी हिलती है”।

कांग्रेस का ऐसा बचाव!!

यह निष्कर्ष सच से इतना परे था कि मेरी जानकारी में सिर्फ़ एक और आदमी ऐसा नादानी भरा दावा कर सकता है और वो है राहुल गांधी.

अर्णब गोस्वामी को जनवरी, 2014 में दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने सचमुच यह दावा किया था कि 1984 में कांग्रेस सरकार ने दंगों को रोकने का प्रयास किया था जबकि गुजरात में मोदी सरकार ने दंगे होने दिए थे।

लेकिन कांग्रेस के बारे में वह सच्चाई के कोसों दूर थे. 1984 में सेना की तैनाती में जानबूझकर देरी की गई, पुलिस ने दख़ल देने से इनकार कर दिया, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कमल नाथ, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार पर आरोप लगे कि उन्होंने दंगाइयों का नेतृत्व किया जिन्होंने सिखों को मारा और उनका सामान लूट लिया।

दंगाई साफ़ तौर पर किसी के इशारों पर काम कर रहे थे और संगठित थे. इसके बाद पार्टी में कमलनाथ रॉकेट की तरह ऊपर उठे. टाइटलर, भगत और सज्जन कुमार को बचाने की कोशिशें भी अच्छी तरह इतिहास में दर्ज हैं. पार्टी उन्हें चुनावों में उतारती रही और वे महत्वपूर्ण पदों पर काबिज़ रहे.

इंदिरा गांधी की हत्या क्यों

1970 के दशक में इंदिरा द्वारा लगाए गए भारतीय आपातकाल के दौरान, स्वायत्त सरकार के लिए चुनाव प्रचार के लिए हज़ारों सिखों को क़ैद कर लिया गया था। इस छुट-पुट हिंसा के चलते एक सशस्त्र सिख अलगाववादी समूह को भारत सरकार द्वारा एक आतंकवादी संस्था के रूप में नामित कर दिया गया था।

जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के द्वारा इंदिरा गाँधी ने भारतीय सेना को स्वर्ण मंदिर पे क़ब्ज़ा करने का आदेश दिया और सभी विद्रोहियों को खत्म करने के लिए कहा, क्यूंकि स्वर्ण मंदिर पर हथियार बांध सिख अलगाववादियों से क़ब्ज़ा कर लिया था। भारतीय अर्धसैनिक बलों द्वारा बाद में पंजाब के ग्रामीण इलाक़ों से अलगाववादियों को ख़तम करने के लिए एक ऑपरेशन चलाया था।

इन दंगो का मुख्य कारण स्वर्ण मंदिर पर सिक्खो का घेराव करना था। सिक्खो की मांग एक ख़ालिस्तान नाम का एक अलग देश बनाने की थी जहाँ केवल सिख और सरदार ही रहेंगे परन्तु कांग्रेस सरकार इस के लिए तैयार नहीं थी सिख कई चेतावनियों के बाद भी मंदिर को नहीं छोड़ रहे थे इसी के चलते इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर पर से सिक्खों को हटाने के लिए मिलिट्री की सहायता ली और वहाँ हुई मुठभेड़ में बहुत से सिख मारे गए।

यह देख कर इंदिरा गांधी के दो अंगरक्षक जो के सिख थे उन्होंने 31 अक्तुबर को इंदिरा गांधी पर गोलियाँ चला कर उनकी हत्या कर दी।

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