Home राजनीति बंगाल की सियासी फिजा में बदलाव के संकेत ममता दीदी को भाजपा के डर से अब नहीं आती नींद

बंगाल की सियासी फिजा में बदलाव के संकेत ममता दीदी को भाजपा के डर से अब नहीं आती नींद

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पश्चिम बंगाल राजनीतिक रूप से एक जागरूक राज्य है। एक समय बंगाल देश के औद्योगिक और अार्थिक मानचित्र में शीर्ष पर था।

राजनीतिक कारणों से यह राज्य हर क्षेत्र में पिछड़ता चला गया। इसके बावजूद बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बंगाल पर गर्व है। ममता अाज भी यह कहते नहीं थकती है कि ह्वाट बंगाल थिंक्स टुडे इंडिया थिंक्स टुमोरो यानी बंगाल जो अाज सोचता है वह पूूरा देश कल सोचता है। वैचारिक रूप से अाज भी बंगाल समृद्ध है लेकिन बदलते समय के साथ व्यवहारिक राजनीति विचारधारा पर हावी होती जा रही है। इसलिए अानेवाले समय में बंगाल में दक्षिणपंथी राजनीति पूरी तरह हावी हो जाए तो कोई अाश्चर्य की बात नहीं होगी।

बंगाल में तीन दशक से अधिक समय के वामपंथी शासन में यहां की जनता स्वभाव से वामपंथी हो गई थी। जाति-पात और धर्म बंगाल की राजनीतिक को कभी प्रभावित नहीं कर सका। यहां की राजनीति पर बौद्धिकता हावी रही है। यही वजह है कि 2011 में बंगाल में राजनीतिक परिवर्तन होने के बावजूद ममता ने वामपंथियों की राह का ही अनुसरण किया। हालांकि बंगाल में वामपंथी शासन का अंत करने का श्रेय ममता बनर्जी को ही जाता है। वैसे तो सिंगुर और नंदीग्राम अांदोलन के समय ही ममता ने वामपंथ की जड़े हिला कर रख दी थी।

माकपा को 2009 के लोकसभा चुनाव में ही बंगाल से लाल झंडा के उखड़ने का अाभास मिल गया था। तब माकपा ने प्रचारित किया कि राज्य में राजनीतिक परिवर्तन होने पर बंगाल में खून खराब होगा। लेकिन ममता के लगातार अांदोलन ने रंग लाया और 2011 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की मिट्टी से माकपा की मजबूत जड़ उखड़ गई। लेकिन अाश्चर्य की बात है कि 34 वर्षों के लंबे वामपंथी शासन का अंत होने के बाद बंगाल में कोई बड़ी हिंसा की घटना नहीं हुई जैसा कि अाशंका थी। लेकिन अब राज्य में राजनीतिक परिवर्तन होता है तो वह हिंसा से अछूता नहीं होगा। इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

बंगाल में भाजपा का प्रभाव बढ़ते देख ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने भी बहुसंख्यक हिंदू वोटरों का दिल जीतने के लिए रामनवमी के मौके पर जुलूस निकाला। अारएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने पहले से ही रामनवमी पर राज्यव्यापी शोभा यात्रा निकालने की तैयारी की थी। 25 और 26 मार्च को दोनों पार्टियों की ओर से रामनवमी पर जुलूस निकालने से राज्य के विभिन्न भागों में टकराव की स्थिति पैदा हुई। कहीं-कहीं दो संप्रदायो के बीच संघर्ष होने से सांप्रदायिक तनाव पैदा हुअा।

रामनवमी पर भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने अस्त्र -शस्त्र लेकर जुलूस निकाला। हथियार के साथ जुलूस में शामिल होने पर बंगाल भाजपा महिला मोर्चा की नेता लॉकेट चटर्जी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष के विरुद्ध पुलिस ने एफअाइअार दर्ज किया है। सांप्रदायिक हिंसा में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है और दर्जनों घायल हैं। घायलों में एक पुलिस अधिकारी भी शामिल है जिनका एक हाथ बम लगने से उड़ गया है।

बंगाल के पूर्व कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ज्योति बसु भाजपाा को बर्बर कहते थे। राज्य की जनता भी इस बात को तब मानती थी और यही वजह है कि बंगाल में भाजपा को तब अछूत माना जाता था। बुद्धिजीवी व सुशिक्षित बंगाल की जनता की जुबान पर भूल से भी भाजपा का नाम नहीं अाता था। यह बात सच है कि हताश होकर ममात ने वामपंथियों से लड़ने के लिए एक समय भाजपा की मदद ली थी। लेकिन बाद में वह अपनेे बूते ही माकपा को हराने में सफल हुईं। बंगाल के कुछ शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में गैर बंगाली एक बड़ी अाबादी को संदेह की नजर से देखा जाता था। इसलिए कि उसमें अधिकांश कांग्रेस समर्थक थे।

लेकिन मान भी लिया जाए कि बंगाल के शहरी क्षेत्रों की गैर बंगाली अाबादी अाज भाजपा समर्थक हो गई है तो फिर वीरभूम, मुर्शिदाबाद, पुरूलिया, वर्दवान और मेदिनीपुर अादि पूरी बंगाली अाबादी वाले क्षेत्रों में रामनवमी के जुलूस में हथियार लेकर शामिल होनवाली भीड़ को क्या समझा जाए़। बंगाल की जो जनता कभी भाजपा का नाम लेने से भी परहेज करती थी वह अाज उसके जुलूस और शोभा यात्रा में शामिल हो रही है। क्या यह बंगाल की प्रबुद्ध जनता के स्वभाव में बदलाव के संकेत नहीं है। बंगाली जनता के स्वभाव में यह बदलाव बंगाल में एक नया राजनीतिक परिवर्तन का कारण बन सकता है। ऐसे में बंगाल को लेकर भाजपा को उत्साहित होना स्वभाविक है।

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