Home मनोरंजन दक्षिण के स्टार्स क्यों छूते रहे हैं राजनीति का शिखर?

दक्षिण के स्टार्स क्यों छूते रहे हैं राजनीति का शिखर?

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दक्षिण के अभिनेताओं में यह ख़ास बात है कि वे राजनीतिक रूप से उत्तर भारत के स्टार्स से ज़्यादा सजग दिखते हैं। इसी महीने के शुरू में प्रकाश राज ने केरल में एक भाषण दिया था। भाषण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे थे और कह रहे थे कि इन दिनों देश में जैसे बोलने पर पहरा लगा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि यह अकेला स्टेट है, जहां बिना किसी डर के सांस ले सकते हैं। यह सब कोई भी कह सकता है, लेकिन अगर एक अभिनेता कहता है तो हमारे कान खड़े हो जाते हैं। चौंकते इसलिए हैं कि आमतौर पर अभिनेता इस तरह का स्टैंड लेने से बचते हैं। वह हर विचारधारा से आने वाले फैन्स की फाॅलोइंग चाहते हैं। किसी को खोना नहीं चाहते। लेकिन दक्षिण भारत में ऐसा क्या है कि अभिनेता घबराते नहीं। जब गौरी लंकेश की हत्या हुई थी, तब भी प्रकाश राज ने आरएसएस पर काफी तीखा वार किया था।

सुपर स्टार रजनीकांत भी वक़्त वक़्त पर व्यवस्था विरोधी बयान देने के लिए विवादों में रहे हैं, लेकिन अब उनकी ख़ुद की इच्छा है कि सीधी सियासत करें। किसी पुरानी पार्टी के साथ वह तालमेल बिठाएंगे या कोई नयी पार्टी बनाएंगे, इसके बारे में तमाम क़यासों से 31 दिसंबर को परदा उठ सकता है। कमल हसन भी अक्सर व्यवस्था पर तीखे हमले करते रहे हैं और इस बात को ज़ोर देकर कहते रहे हैं कि चूंकि वह वोट देते हैं लिहाज़ा राजनीति पर बात करना उनका हक़ है। दक्षिण से आये बाॅलीवुड डायरेक्टर रामगोपाल वर्मा भी राजनीतिक ट्वीट करते रहते हैं। जब दिल्ली में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का मूवमेंट चला था, तब ज़रूर मुंबई में सिने सितारों का एक तबका राजनीतिक रूप से मुखर हुआ था। लेकिन मूवमेंट के पार्टीगत राजनीति में स्थानांतरण होने के बाद उनमें से ज़्यादातर किनारे लग गये।

ख़ैर, हम बात कर रहे हैं दक्षिण के फ़िल्मी सितारों की और राजनीतिक रूझानों की। इसकी शुरुआत एमजी रामचंद्रन से होती है, जो तमिल अभिनेता थे और 1977 से लेकर 1987 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। बाद में उनकी राजनीतिक विरासत को जयललिता ने संभाला, जो रामचंद्रन की काफ़ी क़रीबी भी रही थीं। एमजी रामचंद्रन के साथ जयललिता ने कई फ़िल्मों में अभिनय किया था। जयललिता 1991 से 1996 , 2001 में, 2002 से 2006 तक और 201 से 2014 तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं। तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश में राजनीतिक शिखर छूने की शुरुआत एनटी रामाराव ने की, जो अपने ज़माने में तेलुगु के मशहूर अभिनेता थे। बीजेपी से पहले उनका ही नारा था, आंध्रप्रदेश को कांग्रेसमुक्त बनाने का। 1982 में उन्होंने तेलुगुदेशम पार्टी बनायी और अगले ही साल भारी बहुमत से जीत कर सत्ता में आये। 1983 से लेकर 1994 तक पूरे ग्यारह साल आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।

उत्तर भारत से बाॅलीवुड में क़ामयाब हुए अभिनेता भी राजनीति में गये, लेकिन उनमें से किसी का भी अपना जनाधार नहीं रहा। वे पार्टियों के टूल की तरह इस्तेमाल होते रहे। चाहे वे अमिताभ बच्चन हों, शत्रुघ्न सिन्हा हों, राजेश खन्ना हों, विनोद खन्ना हों, गोविंदा हों या धर्मेंद्र-हेमामालिनी हों। इस वक़्त ज़रूर स्मृति ईरानी केंद्रीय मंत्रालय संभाल रही हैं, लेकिन याद रखना होगा कि वह अमेठी में अपना चुनाव हार चुकी थीं।

राजनीतिक जनाधार से बाॅलीवुड अभिनेताओं की दूरी शायद इसलिए भी है क्योंकि अपने क्षेत्र में उनकी गतिविधियां न्यून होती हैं। उनकी सारी गतिविधियां मुंबई केंद्रित होती हैं और इसलिए सिर्फ़ और सिर्फ़ लोकप्रियता के आधार पर राजनीति में उनका आना-जाना होता है। इसके बरक्स दक्षिण के अभिनेता चूंकि अपने इलाक़े में रहते हैं, इसलिए स्थानीय मुद्दों को लेकर उनकी समझ साफ़ होती है और उनका हस्तक्षेप स्थानीय लोगों के लिए मायने रखता है।

सौ बात की एक बात कि राजनीति में लोकप्रिय लोगों को आना चाहिए। सिनेमा एक लोकप्रिय विधा है, लेकिन हिंदी सिनेमा की दिक़्क़त यह है कि उसका कार्य-व्यापार हिंदी प्रदेशों से बहुत दूर है। अगर बाॅलीवुड सिनेमा का विकेंद्रीकरण हो और पटना, लखनऊ, भोपाल और जयपुर जैसे शहरों में फ़िल्में बनने लगें, तो संभव है कि सिने सितारे दक्षिण के अभिनेताओं की तरह राजनीति में कामयाब होने लगें। फ़िलहाल तो राजनीति में जैसे उनका आना-जाना लगा है, वैसे लगा रहेगा।

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