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राहुल ने कर्नाटक में सीखा हार को जीत में बदलने का मंत्र

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राहुल ने जिस तरीके से बीजेपी को सत्ता में आने से रोका है, जिस किस्म की राजनीति की है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि राहुल ने कर्नाटक से हारने के बावजूद जीत का मंत्र सीख लिया है। एक फॉर्मूला कर्नाटक से निकला है। वही फॉर्मूला जिसे खुद राहुल गांधी ने बिहार में महागठबंधन के तौर पर इजाद किया था और जिस फार्मूले को यूपी में गोरखपुर और फूलपुर में आजमाया गया।

कर्नाटक में राहुल गांधई ने सीखा है हार को जीत में बदलने का मंत्र। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी एक नेता की जीत हुई है तो वह हैं राहुल गांधी। राहुल गांधी ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव की कमान सम्भाली थी। हार और जीत से उनके भविष्य को आंका जा रहा था। कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया, मगर ये बीजेपी की राजनीति है जिसने कांग्रेस को विजेता बनाकर पेश किया है।

राहुल ने दी चुनाव के बाद तगड़ी राजनीतिक फाइट

चुनाव के बाद जिस तरह से राज्यपाल ने पक्षपात कर बीजेपी के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को शपथ दिलायी, उसे राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने बेनकाब कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी। आधी रात के वक्त लड़ाई लड़ी। विधायकों को खरीद-फरोख्त से बचाया।

नरेंद्र मोदी से राहुल गांधी कर्नाटक चुनाव में सीधी लड़ाई लड़ी। सत्ता से बाहर होकर भी सबसे ज्यादा राहुल ने वोट बटोरे। बीजेपी को गलत तरीके से सरकार बनाने से रोका।

राहुल ने पीएम मोदी से सीधी लड़ाई लड़ी

न सिर्फ विधानसभा चुनाव के दौरान बल्कि विधानसभा चुनाव के बाद भी राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘हेड ऑन’ छोड़ना नहीं। राहुल गांधी ने येदियुरप्पा सरकार के इस्तीफे के बाद बीते चार दिनों के दौरान खरीद-फरोख्त और राजनीतिक संकट के लिए सीधे प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराया। बिना बहुमत के सरकार बनाने का उन्हें गुनहगार ठहराया। राहुल ने पीएम मोदी को भ्रष्टाचार का प्रतीक भी कहा।

कांग्रेस पार्टी को न सिर्फ एकजुट रखा, जेडीएस भी एकजुट रहा

रणनीतिक रूप से कांग्रेस जिस तरह से कर्नाटक में सक्रिय दिखी। जो भूमिका गुलाम नबी आजाद ने दिखलायी, वह कांग्रेस के जागने का प्रतीक है। राहुल गांधी भी कर्नाटक में उठापटक के दौरान लगातार सक्रिय रहे।

चुनाव नतीजे आने के बाद जेडीएस के कुमारस्वामी को नेता मानने में कांग्रेस ने देरी नहीं की। यह कांग्रेस नेतृत्व में आया बड़ा परिवर्तन है जिसका श्रेय राहुल गांधी को जाता है।

जेडीएस को कमान देने में देरी नहीं की

राहुल गांधी के नेतृत्व की परिपक्वता का ये सबसे बड़ा प्रमाण नज़र आया। त्रिशंकु विधानसभा बनने पर बीजेपी के लिए सरकार बनाना और बहुमत साबित करना बहुत आसाना होता अगर कांग्रेस ने जेडीएस के साथ दूरी कम न की होती। राहुल गांधी ने यह मानते हुए जनता का मत कांग्रेस के खिलाफ है उन्होंने जेडीएस के नेतृत्व को आगे किया और जनादेश को इस रूप में परिभाषित किया कि यह कांग्रेस और जेडीएस की गठबंधन सरकार चलाने का जनादेश है।

कांग्रेस को कर्नाटक में सबसे अधिक वोट मिले

यह तथ्य नकारने योग्य नहीं है कि कर्नाटक में कांग्रेस को हार के बावजूद सबसे अधिक वोट मिले। अगर सीटों की हार का ठीकरा राहुल पर फोड़ा जाए तो वोटों के अधिक मिलने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाना चाहिए। ये बात साबित हुई है कि कर्नाटक में राहुल के नेतृत्व के प्रति विश्वास बढ़ा है।

2019 के लिए भी लिया सबक

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में निश्चित रूप से कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई। राहुल गांधी की ये रणनीतिक हार थी। जेडीएस से अलग हटकर चुनाव लड़ने का नतीजा था। राहुल गांधी ने इसे कबूल किया। यही वजह है कि जेडीएस के नेतृत्व में कांग्रेस कर्नाटक में सरकार बनाने को तैयार हुई। अब कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस मिलकर बीजेपी के सामने बहुत मजबूत राजनीतिक ताकत बन चुकी है। यही ताकत 2019 में आम चुनाव लड़े तो चमत्कार हो सकता है। कह सकते हैं कि राहुल गांधी ने कर्नाटक से होर को जीत में बदलने का का मंत्र सीखा है।

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