Home राजनीति वोट बैंक की राजनीति में फंसे नीतीश कुमार, नहीं बन सकते महागठबंधन के नेता

वोट बैंक की राजनीति में फंसे नीतीश कुमार, नहीं बन सकते महागठबंधन के नेता

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महागठबंधन का नेता बनने के लिए पहले से इन बड़े चेहरों से होगा सामना, सत्य को समझ कर नीतीश कुमार लगातार दोहरा गेम खेलने की कोशिश कर रहे हैं, अगर वे एनडीए से अलग होते हैं तो महागठबंधन में भी उन्हें नहीं मिलेगा उचित प्रतिनिधित्व.

नीतीश कुमार की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं.

नीतीश कुमार महागठबंधन के नेता हो सकते हैं या नहीं? इस सवाल का सीधा सा जवाब अब है, नहीं। इसके लिए आपको तमाम पहलुओं पर विचार करना होगा। उनका मुकाबला महागठबंधन के उन तमाम दिग्गजों से हैं, जिनके नाम के साथ एक बड़ा वोट बैंक जुड़ा है। नीतीश कुमार के साथ जो वोट बैंक है, वह किसी दल की जीत को तय करने में तो सक्षम है, लेकिन अपने दम पर चुनाव जिता ले जाने कारगर नहीं है। हाल के दिनों में जदयू ने नागालैंड व कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई और वहां पार्टी को सफलता नहीं मिल सकी। झारखंड में जदयू की जमीन खिसक चुकी है। गुजरात व राजस्थान में भी पार्टी उस स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल नहीं हो पा रही है।

नीतीश कुमार बड़े भाई की भूमिका चाहते हैं, लेकिन वोट कहां से लाएंगे.

जदयू का राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार इन चुनावों के आंकड़ों से साफ पता चलता है। अब बिहार की बात करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने करीब 40 फीसदी वोट हासिल किया था। 2015 के विधानसभा चुनावों में महागठबंधन को भी करीब इतना ही वोट शेयर मिला। भारतीय जनता पार्टी 34 फीसदी वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर रही। महागठबंधन के महत्वपूर्ण घटक लालू प्रसाद यादव की राजद के पास करीब 30 फीसदी वोट शेयर हमेशा से रहा है। माय (मुस्लिम व यादव) समीकरण के सहारे लालू प्रसाद ने 15 वर्षों तक बिहार की सत्ता को अपने कब्जे में रखा। जब उनके वोट बैंक से दलित खिसका तो एनडीए की सरकार बनी।

पीएम नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए बना है देश में महागठबंधन.

नीतीश कुमार के वोट बैंक की बात करें तो उनकी छवि के सहारे छह से आठ फीसदी वोट इधर या उधर जाता है। मतलब, वे अपने दम पर किसी भी चुनाव को जीत नहीं सकते हैं। दो बार नीतीश कुमार ने अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरने की कोशिश की। समता पार्टी के दौर को छोड़ दें तो जदयू को उन्होंने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उतारा। इस चुनाव में नीतीश कुमार को दो सीटें मिली। लेकिन, वोट प्रतिशत के लिहाज से उनकी पार्टी को वोट इसी आधार पर मिला। ऐसी स्थिति में उनहें महागठबंधन का नेता मान लिया जाना संभव नहीं हो सकेगा। वहीं, नीतीश कुमार सीधे नरेंद्र मोदी को अब अकेले दम पर चुनौती देते भी नहीं दिख पा रहे हैं। महागठबंधन उनकी शराबबंदी व अन्य सामाजिक योजनाओं में खोट निकाल रही है, ऐसे में तत्काल उसकी अच्छाई गिना पाना संभव नहीं होगा।

अब नीतीश कुमार के सामने दुविधा की स्थिति बनी हुई है

एनडीए से अगर नीतीश कुमार अलग होने का फैसला लेते हैं तो महागठबंधन में इस बार राजद अपने हिसाब से सीटों का बंटवारा करेगी। राजद के नेता तेजस्वी यादव ने साफ कर दिया है कि वे नीतीश कुमार को किसी भी स्थिति में अपने साथ लाने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन, गठबंधन के अन्य घटक दलों का दबाव बढ़ा तो वे नीतीश कुमार को अपने साथ शामिल कर सकते हैं। राजद 22 से 25 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस को आठ से दस सीटें मिलेंगी। हम पार्टी को भी राजद कम से कम तीन सीट देगी। इसके अलावा एक-दो अन्य उम्मीदवारों को भी पार्टी उतारने की तैयारी है। ऐसे में जदयू को महागठबंधन में तीन से पांच सीट ही मिल सकेगी। इतनी सीटों से नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को मजबूत नहीं बना पाएंगे।

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