Home राजनीति लालू के आगे बिहार में कहीं नहीं टिकते हैं नीतीश, दूसरे कंधों पर बैठ बने हैं सीएम!

लालू के आगे बिहार में कहीं नहीं टिकते हैं नीतीश, दूसरे कंधों पर बैठ बने हैं सीएम!

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बिहार की राजनीति में लालू यादव के आगे कहीं भी नीतीश कुमार नहीं टिकते हैं। लालू अपने बूते बिहार की राजनीति में 15 सालों तक शासन किया है। लेकिन नीतीश कुमार कभी भी अकेले चुनाव लड़कर कमाल नहीं कर पाए हैं। लालू प्रसाद यादव का अपना वोट बैंक हैं। जिसके सहारे वे राजनीति करते हैं। अगर जातिगत आधार को भी देखें लालू यादव के आगे नीतीश कुमार कहीं नहीं टिकते हैं

लालू यादव बिहार की राजनीति में यादव और मुस्लिम वोट बैंक को अपना समझते हैं। लालू यादव जब बिहार की सत्ता से बेदखल भी रहें तो उनका वोट बैंक कभी नहीं खिसका। बिहार में यादवों और मुस्लिमों का वोट करीब 31 फीसदी है। इसके साथ ही लालू अब दलित वोटरों पर भी डेरा डाले हुए हैं। लालू सत्ता में नहीं हैं, लेकिन उनके इशारों पर हजारों लोग आज भी जमा हो जाते हैं। लालू और नीतीश कुमार के कार्यशैली में जरूर अंतर दिखता है।

लालू यादव किसी से भी बिल्कुल ठेठ अंदाज में बात करते हैं। वहीं, नीतीश सौम्य नजर आते हैं। नीतीश कुमार ने दूसरे कंधों पर बैठ कर ही हमेशा बड़े बने रहे हैं। नीतीश कुमार कुर्मी जाति से आते हैं, बिहार में यह जाति चार फीसदी के करीब है। ऐसे में जातिगत फैक्टर नीतीश के पास कुछ खास वोट बैंक नहीं है।

अपने राजनीतिक करियर के दौरान नीतीश कुमार दो बार बिना गठबंधन के चुनाव लड़े हैं। एक बार जब समता पार्टी के जमाने में 1995 में जब नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया तो उनकी पार्टी दहाई की आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई।

उसके बाद से नीतीश कुमार बीजेपी के साथ ही मिलकर चुनाव लड़ते हैं। नीतीश कुमार पहली बार सीएम बीजेपी के सहयोग पर ही बने।

नरेंद्र मोदी के नाम पर जून 2013 में नीतीश कुमार ने बीजेप का साथ छोड़ दिया। 2014 का लोकसभा चुनाव अकेला लड़ा, बमुश्किल से उनकी पार्टी दो सीट ही जीत पाई। उसमें से भी पूर्णिया का उम्मीदवार उनका उधारी का ही था।

2015 के विधानसभा चुनाव में अपने चिरप्रतिद्वंदी लालू यादव से उन्होंने हाथ मिला लिया। लालू यादव की पार्टी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर भी बिहार के नेताओं में सबसे ज्यादा लोग लालू को फॉलो करते हैं। लालू का मजकिया अंदाज ही उन्हें और लोग से अलग बनाता है।

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